writer Nehal patil, 1 जनवरी 1818 भारतीय इतिहास का वह दिन है जिसे लंबे समय तक दबाने की कोशिश की गई।
यह केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि जातिवादी पेशवा सत्ता के खिलाफ बहुजन समाज की ऐतिहासिक जीत थी।
भीमा नदी के तट पर स्थित कोरेगांव में लड़ा गया यह युद्ध आज बहुजन शौर्य दिवस के रूप में याद किया जाता है।
भीमा कोरेगांव का युद्ध: क्या हुआ था?
पेशवा बाजीराव द्वितीय की 27,000 सैनिकों की विशाल सेना के सामने
ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़ रहे लगभग 500 महार सैनिक डटकर खड़े थे।
महार समाज उस समय सामाजिक रूप से अछूत माना जाता था।
पेशवा शासन में उन्हें शिक्षा, सम्मान और समान अधिकार नहीं थे।
इसके बावजूद इन सैनिकों ने युद्धभूमि में अद्भुत साहस दिखाया
और पेशवा सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
विजय स्तंभ और महार सैनिकों का बलिदान
1822 में इस युद्ध में शहीद हुए महार सैनिकों की स्मृति में
भीमा कोरेगांव विजय स्तंभ का निर्माण किया गया।
इस स्तंभ पर महार सैनिकों के नाम खुदे हैं,
जो यह साबित करते हैं कि यह जीत कोई कल्पना नहीं बल्कि ऐतिहासिक सत्य है।
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर और भीमा कोरेगांव
1927 में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने भीमा कोरेगांव जाकर
विजय स्तंभ को नमन किया।
यहीं से भीमा कोरेगांव
एक युद्ध स्मारक से आगे बढ़कर
बहुजन स्वाभिमान और चेतना का प्रतीक बन गया।
यह इतिहास क्यों असुविधाजनक है?
भीमा कोरेगांव की जीत उन ताकतों को असहज करती है
जो जातिवादी श्रेष्ठता बनाए रखना चाहती हैं
और बहुजन समाज की वीरता स्वीकार नहीं कर पातीं।
आज का संदेश
भीमा कोरेगांव हमें सिखाता है कि
जब शोषित समाज संगठित होता है
तो सबसे बड़ी सत्ता भी हार जाती है।
नमन और संकल्प
हम नमन करते हैं
भीमा कोरेगांव के वीर महार सैनिकों को
और संकल्प लेते हैं कि
समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की लड़ाई जारी रहेगी।
जय भीमा
जय संविधान

